Sarpgandha ki Kheti kaise karen? सर्पगंधा की खेती कैसे करें?

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Sarpgandha ki Kheti kaise karen? सर्पगंधा की खेती कैसे करें?

सर्पगंधा एक औषधीय पौधा है। इसकी कई प्रजातियाँ पायी जाती है। जिनमें से राउभोलफिया सर्पेंटीना और राउभोलफिया टेट्राफाइलस प्रजाति के पौधों को औषधीय पौधों के रूप में उगाया जाता है। ये एक बहुवर्षीय झाड़ीनुमा पौधा है ऊँचाई 30 -75 सेमी तक की ऊँचाई वाले पौधे में हरे चमकीले रंग के 10 -15 सेमी लम्बाई में पत्तियाँ होती है। इसके फूल सफ़ेद या गुलाबी रंग के गुच्छे में निकलते हैं तथा फलों का रंग गहरा बैंगनी अथवा काला छोटे एवं गोलाकार होता है।

सर्पगंधा की जड़ का प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता है। इसकी नरम जड़ों से सर्पेन्टीन नामक औषधि प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त रेसरपीन, सरपेजीन,रौलवेनिन, टेट्राफीरलीन आदि अल्कलाइड प्राप्त होता है। औषधीय पौधा होने के कारण इसकी माँग राष्ट्रिय एवं अंतराष्ट्रीय बाजार में बानी रहती है इसके जड़ की बिक्री 70 -80 रु प्रति किलोग्राम होती है। अतः इसकी खेती से किसानो को अच्छी आमदनी होती है। आइये देखें सर्पगंधा की खेती करने की जानकारी।

 

Climate and soil required for farming खेती के लिए आवश्यक जलवायु एवं मिटटी 

सर्पगंधा की खेती के लिए उष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। इसके फसल बढ़ने के लिए 10 – 38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान एवं 1200 -1800 मिलीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

सर्पगंधा की फसल के लिए भूमि का पीएच मान 6 -8 .5 तक होना चाहिए। खेती के लिए बलुई दोमट एवं कपासीय काली मिटटी, जिसमें जीवाश्म अधिक हो एवं जलनिकासी अच्छी तरह हो उपयुक्त होती है।

Method of Planting Crops  फसल रोपण करने की विधि 

सर्पगंधा की खेती बीज, तने के कलम एवं जड़ के कलम द्वारा किया जा सकता है। इसके बीज का अंकुरण सामान्यता 10 -50 % तक ही होता है। एक वर्ष से अधिक समय से स्टोर किये हुए बीजों का अंकुरण नहीं होता है। अतः वर्ष के सितम्बर से नवंबर माह तक में स्टोर किये हुए बीजों का उपयोग  करना आवश्यक हो जाता है।

बीजों द्वारा खेती

इसके लिए मुख्य खेत में रोपाई करने से पहले नर्सरी तैयार करना होता है। बीजों की बुआई वर्षा ऋतु के आरम्भ में मई -जून महीने में नर्सरी में किया जाता है। बीजों को बुआई से पहले 4 किलोग्राम बीज के लिए 2 ग्राम थीरम के प्रयोग से उपचारित किया जाता है। इसके बाद मुख्य खेत में रोपाई अगस्त महीने में की जाती  है बीजों की रोपाई से पहले 24 घंटे तक बीज को पानी में डूबा कर रखने से अंकुरण अच्छा होता है।

एक हेक्टेअर खेत के लिए लगभग 8 -9 किलो बीज की आवश्यकता होती है। नर्सरी में बीजों को  20 -25 सेमी के फासले पर बने कतार में 2 सेमि गहरे कुंड में 2 -5 सेमि की दूरी पर गिराते हैं। फिर 2 महीने बाद 10 -12 सेमी के पौधों की रोपाई 45 -50 सेमी की दूरी पर किया जाता है।

जड़ के कलम द्वारा

जड़ से कलम तैयार करने के लिए पेंसिल जितनी मोटाई के 2 .5 – 5 सेमि लम्बाई के छोटे -छोटे टुकड़े काटने के बाद 5 सेमी की गहराई में नर्सरी में रोपाई की जाती है। तीन सप्ताह बाद कल्ले आने पर मुख्य खेत में रोपाई की जाती है।

तने के कलम द्वारा

तने से कलम तैयार करने के लिए 15 -20 सेमी मोटाई के कलम बनाये जाते हैं प्रत्येक तने के टुकड़े में दो -तीन गाँठ होना आवश्यक है। कलम को नर्सरी में लगाने के 4 -6  सप्ताह बाद जड़युक्त तना तैयार हो जाता है। इसके बाद मुख्य खेत में जड़युक्त तने की रोपाई की जाती है।

 

Farm Preparation  खेत तैयार करना 

सर्पगन्ध के फसल के लिए मई महीने में खेत की जुताई की जाती है। इसके बाद वर्षा प्रारम्भ होने पर 200 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद प्रति एकड़ खेत में मिलाया जाता है। पौधे की रोपाई के दौरान 45 किलो नाइट्रोजन, 45 किलो फॉस्फोरस, 45 किलो पोटाश प्रति हेक्टेअर की दर से खेत में डाला जाता है। नाइट्रोजन की 45 किलो मात्रा दो बार अक्टूबर एवं मार्च में पुनः खेत में डालना होता है।

Weeding and Irrigation  निराई -गुड़ाई एवं सिंचाई

खेत से खर -परवार निकालने के बाद जनवरी माह से वर्षाकाल आरम्भ होने तक 30 दिन के अंतराल पर एवं जाड़े के दिनों में 45 दिनों के अंतराल पर खेत में सिंचाई करना होता है।

Crop Disease Control Method फसल रोग नियंत्रण विधि 

जड़ गलन रोग

सर्पगंधा की फसल में जड़ गलन रोग का कारण मैलोएडोगाइन इनकोगनीटा और मैलोएडोगाइन हाप्ला है। इस रोग से फसल प्रभावित होने पर जड़ें गलने के साथ ही पत्तियों का विकास रुक जाता है। रोग नियंत्रण के लिए 10 जी फोरेट ग्रैनुलस 5 किलोग्राम अथवा 3 जी कार्बोफिउरॉन 10 किलोग्राम की मात्रा में प्रति एकड़ खेत में डालने के लिए प्रयोग करना चाहिए।

पत्तियों पर धब्बा रोग

इस रोग से फसल प्रभावित होने पर पत्तियों के ऊपरी और नीचली सतह पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इस रोग को नियंत्रित करने के लिए प्रति हेक्टेअर खेत की दर से 400 ग्राम डाइथेन एम- 45 को 150 लीटर पानी में मिलकर घोल तैयार करने के बाद खेत में छिड़काव करना चाहिए।

गहरे भूरा धब्बा रोग

इस रोग से प्रभावित होने पर फसल की पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ने लगते हैं। रोग नियंत्रण के लिए 30 ग्राम ब्लीटॉक्स को 10 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ खेत के हिसाब से स्प्रे करना चाहिए।

Harvesting and Production  कटाई एवं उपज 

सर्पगंधा डेढ़ से दो वर्षों का बहुवर्षीय फसल है पौधों को खेत में छोड़ देने पर फसल उपज बढ़ जाती है। तीन वर्षों तक फसल खेत में लगे रहने पर अधिकतम उपज प्राप्त होती है। ठण्ड के मौसम में इसकी पत्तियाँ गिर जाती हैं। इसे उखाड़ते समय जड़ से छिलका न हटने देने का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।

जड़ को 12 – 15  सेमी टुकड़ों में काटकर सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। सूखने पर जड़ के भार में 50 -60 % कमी आ जाती है। सर्पगंधा की औसत उपज 100 किलो प्रति हेक्टेअर प्राप्त होती है। बाजार में बिक्री की दर 70 -80 रूपये प्रति किलो है। अतः एक हेक्टेअर क्षेत्रफल वाले खेत से रु 40 -50  हजार तक की आमदनी प्राप्त हो सकती है।

 

 

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स्त्रोत :

औषधीय पौधों की कृषि 

 

 

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