Organic Farming kya hai? जैविक खेती क्या है?

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Organic Farming kya hai? जैविक खेती क्या है?

विश्व को जैविक कृषि की अवधारणा भारत की देन है। आधुनिकता के प्रवाह और जनसँख्या वृद्धि के साथ फसल की माँग को पूरा करने के लिए भारतीय किसानों द्वारा भी रासायनिक कृषि पद्धति का उपयोग किया जाने लगा। अब लगभग दो दशकों से मानव स्वास्थ्य, मृदा की गुणवत्ता और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने के कारण आज विश्व भर में जैविक उत्पादों की माँग बढ़ी है। जिसकी पूर्ति हेतु भारत सरकार के कृषि मंत्रालय तथा कृषि एवं सहकारिता विभाग के अधीन वर्ष 2004 – 05 से राष्ट्रिय जैविक खेती परियोजना के विस्तार के लिए योजनाबद्ध तरीके से प्रचार -प्रसार की शुरुआत की गयी है।

जैविक खेती परियोजना राष्ट्रिय जैविक खेती केंद्र के अंतर्गत कार्यरत 6 अन्य केंद्रों के माध्यम से क्रियान्वित की जा रही है। 600 से अधिक सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाएं इस परियोजना से जुड़े है। जिनमें लगभग 468 किसान समूह कार्यरत है। इन किसान समूहों द्वारा प्रतिवर्ष 25000 मीट्रिक टन सब्जी बाजार कचरा कम्पोस्ट, 69,214 केचुआ खाद एवं 5600 मीट्रिक टन जैव उर्वरक का  उत्पादन किया जाता है। सरकार द्वारा जैविक कृषि को अपनाने में किसानों की मदद के उद्देश्य से प्रशिक्षण कार्यक्रमो का आयोजिन समय -समय पर किया जाता है। अतः किसानों को जैविक कृषि से सम्बंधित विस्तृत जानकारी होना आवश्यक है।

 

 What is Organic Farming? जैविक खेती क्या है?

जैविक खेती की वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक खाद, कीटनाशक, हार्मोन्स आदि का प्रयोग किये बिना मृदा/मिटटी के उर्वरापन को सुरक्षित रखने के लिए जैव अपशिष्ट, जैविक तथा जीवाणु खाद के उपयोग से फसल उत्पादन की नीति अपनाई जाती है।

 

Basic principles of Organic Farming जैविक खेती के मूल सिद्धांत 

जैविक कृषि आंदोलन के अंतराष्ट्रीय संघ (IFOAM) के अनुसार जैविक खेती के निम्नलिखित सिद्धांत हैं –

स्वस्थता का सिद्धांत

जैविक कृषि के सभी स्वरूपों जैसे फसल उत्पादन, खाद प्रसंस्करण,वितरण, उपयोग आदि सभी प्रकार के सूक्षम -अतिसूक्ष्म जीवों से लेकर मानव तक सभी सम्मलित रूप से पर्यावरण की स्वस्थता में योगदान करते हैं। मानव स्वास्थ एवं पर्यवरण के स्वस्थता के उद्देश्य से भोज्य पदार्थों में किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थों का उपयोग करना वर्जित है।

पर्यावरणीय सुरक्षा

खेती की इस प्रणाली में प्राकृतिक जीव चक्र, जीवंत पर्यवरण एवं उनके रख -रखाव के बीच समन्वय के सिद्धांत पर आधारित है। इस नियम के अनुसार सम्पूर्ण फसल उत्पादन प्रक्रिया प्राकृतिक स्त्रोतों के पुनःचक्रण / रिसाइकिल पर आधारित है उदहारण के तौर पर – पोषण से भरपूर फसल के लिए रसायनमुक्त मृदा, मछली तथा जलीय जीवों के लिए स्वस्थ जलीय वातावरण, पशुओं के लिए अच्छा पर्यावरण उपलब्ध होने पर ही मनुष्यों के लिए स्वस्थ वातावरण उपलब्ध होना संभव है। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कृषि में फार्म हाउस का निर्माण, जैव विविधता का समावेश तथा प्राकृतिक संसाधनों के उचित प्रयोग को अपनाना आवश्यक है।

समता का नियम

इस सिद्धांत के अंतर्गत जैविक कृषि से जुड़े सभी व्यक्ति जैसे – किसान, प्रसंस्करण कर्ता, वितरक एवं उपभोक्ता आदि के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करें। जिससे उच्च जीवनयापन अवसर तथा खाद्यान सुरक्षा की गारंटी के साथ किसानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने में मदद मिल सके। इसके अतिरिक्त पशुओं को भी स्वच्छ आवास एवं पर्यावरण में प्राकृतिक आवश्यकताओं को पूरा करने का वातावरण उपलब्ध हो, जिससे मृदा की उर्वरता को बढ़ाने में मदद मिले और भावी पीढ़ी के लिए स्वस्थ पर्यवरण का नर्माण सुनिश्चित हो सके।

परिचर्या के नियम का पालन

इस सिद्धांत के अंतर्गत प्रबंधन, विकास तथा तकनीकों के चयन में सावधानी रखने के नियम का पालन किया जाता है। नयी तथा जोखिम भरी तकनीकों जैसे परिवर्तित अनुवांशिकी विज्ञान आदि को जैविक खेती से अलग रखा जाता है। किसी भी नयी तकनीक को अपनाने से पहले ये सुनिश्चित किया जाता है कि इसके उपयोग से पर्यावरण, जीव के किसी भी अंग पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

 

  Main points of Organic Farming जैविक खेती के मुख्य बिंदु

यह कृषि प्रणाली पूर्णतया प्राकृतिक प्रक्रियाओं एवं संसाधनों पर आधारित है इसकी विशेषताएं इस प्रकार हैं –

  • मृदा की उर्वरता का संरक्षण।
  • सूर्य प्रकाश तथा विभिन्न जैव रूपों की जैविक क्षमता का सदुपयोग।
  • स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग।
  • जैव अंश तथा पौध पोषणों का पुनः चक्रण रूप से उपयोग।
  • फसल उत्पागन प्रक्रिया में किसी भी रासायनिक तथा परिवर्तित जैव स्वरूपों के उपयोग पर प्रतिबन्ध।
  • सभी जीवों एवं पशुओं के साथ समता का भाव।
  • जैव विविधता का संरक्षण तथा क्रमिक विकास।

 

How to use Natural Resources प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कैसे करें

मृदा की उर्वरता का संरक्षण – खेत की गहरी जुताई करने से बचें, रासायनिक खाद के स्थान पर फसल अवशेषों का उपयोग, जैविक तथा जैव खाद का प्रयोग, फसल चक्र तथा बहु फसलीय प्रणाली को अपनाना चाहिए। इसके आलावा मृदा को हमेशा पौध अवशेषों एवं जै पदार्थों से धक् कर रखना चाहिए।

तापमान प्रबंधन – मृदा को ढँक कर रखना एवं खेत के मेड़ों पर झाड़ियाँ एवं पेड़ों को लगाना।

मृदा जल को सुरक्षित रखना –  जल संरक्षण के लिए खेत में गड्डे करने के माध्यम से तालाब बनाना , कंटूर कृषि (ढलान वाली कृषि भूमि की मिटटी को बरसात के पानी के साथ बहाव/ क्षरण को रोकने के लिए पेड़ों एवं झाड़ियों को रोपना), मेड़ों पर कम ऊँचाई वाले वृक्षारोपण करने के माध्यम से खेत की मिटटी को सुरक्षित करना।

सूर्य ऊर्जा का उपयोग – विभिन्न फसलों के संयोजन एवं पौधा रोपण प्रक्रिया के माध्यम से खेतों में वर्ष भर हरियाली बनाये रखना।

आदानों पर आत्मनिर्भरता – वर्मी कम्पोस्ट, वर्मीवाश, कम्पोस्ट, तरल खाद, पौध सत/अर्क का उत्पादन करना तथा अपने खेत की फसल के लिए बीज को स्वयं विकसित करना।

प्राकृतिक तत्व तथा जीव स्वरूपों की रक्षा – पक्षी एवं पौधों के जीवन यापन के लिए प्राकृतिक स्थान का विकास करना।

प्राकृतिक ऊर्जा का उपयोग – सूर्य ऊर्जा, बैल चलित पम्प, बायो गैस, जेनरेटर तथा अन्य कृषि उपयोगी यंत्र का उपयोग करना।

पशु धन समन्वय – कृषि में पशु बल एक महत्वपूर्ण अंग हैं। ये पशु उत्पाद के अतिरिक्त खेतों की मिट्टी को उर्वरा बनाने के लिए गोबर और मूत्र भी उपलब्ध करवाते है।

 

 

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स्त्रोत

 

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