How to grow Potatoes आलू की खेती कैसे करें

aaloo ki kheti

 

How to grow Potatoes आलू की खेती कैसे करें

 

आलू उत्पादन में भारत का विश्व में तीसरा स्थान है। यह एक कंदवर्गीय श्रेणी के अंतर्गत आने वाली सब्जी है। भारत में केरल और तमिलनाडु राज्य के अतिरिक्त अन्य सभी राज्यों में आलू की खेती की जाती है। सबसे अधिक आलू की खेती पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में की जाती है। हमारे देश में रबी की फसल के साथ आलू की खेती की जाती है। कंद की भूमि के अंदर सुरक्षा के मद्देनज़र दोमट बलुई मिटटी का उपयोग किया जाने के साथ ही जल निकासी का भी उचित प्रबंध होना आवश्यक है। इस सब्जी की माँग अधिक होने के कारण ज्यादातर किसान आलू की खेती करना पसंद करते हैं। यदि आप भी आलू की खेती करने का विचार कर रहें हैं, तो आइये खेती से सम्बंधित पूरी जानकारी।

 

 

Climate, soil and temperature for potato cultivation  आलू की खेती के लिए जलवायु, मिट्टी एवं तापमान मिट्टी 

आलू की खेती के लिए  5.5 – 5.7  पीएच मान वाली बलुई दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। खेत समतल होने के साथ ही जल निकासी की उचित व्यवस्था होना भी आवश्यक है। यही कारण है कि आलू के पैदावार के लिए बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है बलुई दोमट मिट्टी में पानी एवं हवा को अवशोषित करने में अधिक सक्षम होती है। जिससे आलू के कंदो के पोषण के लिए पर्याप्त उर्वरक की पूर्ति हो पाती है। इस प्रकार की मिटटी में जल अवशोषण के बाद चिपचिपापन नहीं रहता है। जिससे आलू के कंद को नुकसान नहीं पहुँचता है।

जलवायु एवं तापमान

आलू की खेती के लिए समशीतोष्ण उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त रहती है। इसकी खेती रबी की फसल के साथ की जाती है। कंदो के विकास के लिए अधिकतम तापमान 25 डिग्री एवं न्यूनतम 15 डिग्री ठीक रहता है। इससे अधिक या कम तापमान आलू की फसल के लिए हानिकारक होता है।

 

आलू की उन्नत किस्मे Improved varieties of Potatoes

आजकल आलू की पैयदवार को देश भर में बढ़ाने के उद्देश्य से क्षेत्रों की जलवायु के आधार  पर कई उन्नत किस्मों का आविष्कार किया गया है। जो निम्नलिखित हैं :

लेडी रोसैट्टा

इस किस्म का उपयोग पंजाब और गुजरात में आलू की अधिक पैदावार करने के लिए किया जाता है। एक हेक्टेअर भूमि में फसल का उत्पादन लगभग 65 टन  तक प्राप्त किया जा सकता है। फसल तैयार होने लगभग 4 महीने का समय लगता है।

कुफरी ज्योति

इस किस्म के आलू के बीज का उपयोग पर्वतीय क्षेत्र में किया जाता है। इन क्षेत्रों में फाल तैयार होने में 130 दिन अर्थात लगभग 4 महीने का समय लगता है। मैदानी क्षेत्रों में फसल तैयार होने में 80 दिन अर्थात लगभग 3 महीने का समय लगता है। इस किस्म के बीज का उपयोग करने पर प्रति हेक्टेअर पैदावार 150 – 250 क्विंटल तक होता है।

कुफरी लवकर

इस किस्म के बीज का उपयोग महाराष्ट्र में अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इसकी फसल 60 – 90 दिनों में तैयार हो जाती है। इससे प्रति हेक्टेअर आलू का उत्पादन 250 क्विंटल के लगभग होता है।

कुफरी अशोक

इस किस्म का उपयोग अधिक पैदावार पाने के लिए मैदानी क्षेत्रों में किया जाता है। फसल तैयार होने में लगभग 80 दिन का समय लगता है। प्रति हेक्टेअर आलू का उत्पादन लगभग 250 क्विंटल तक प्राप्त किया जा सकता है।

जे.ई. एक्स 166 सी.

इस किस्म के बीज का उपयोग उत्तरी राज्यों में किया जाता है। इसकी फसल तैयार होने में लगभग 90 दिन अर्थात तीन महीने का समय लगता है। प्रति हेक्टेअर पैदावार लगभग 300 क्विंटल तक प्राप्त किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त अन्य आलू के बीज की उन्नत किस्मों में जे.एच 22 , कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी बहार, कुफरी पुष्कर, कुफरी बादशाह, कुफरी चिप्सोना- 4 कुफरी सिंधुरी, कुफरी चिप्सोना- 1, कुफरी चिप्सोना- 3 आदि हैं।

 

 

आलू के खेत की तैयारी कैसे करें Potato field preparation

  • आलू की फसल की बुवाई करने से पहले खेत की मिट्टी भुरभुरी करने के लिए खेत की जुताई की जाती है।
  • इसके बाद खेत को कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ दिया जाता हैं।
  • इसके बाद खेत में गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट डालकर फिर से जुताई की जाती है।
  • इसके बाद खेत में पानी की सिंचाई के माध्यम से पलेवा (मिट्टी के ढेलों का चुरा करना) करने की प्रक्रिया की जाती है।
  • फिर खेत की ऊपरी सतह सुखी दिखने पर रासायनिक खाद डीएपी डालकर फिर से जुताई की जाती है।
  • फिर रोटावेटर मशीन लगाकर खेत की मिट्टी को भुरभुरा किये जाने के बाद खेत को समतल बनाया जाता है।
  • फिर खेतों में आलू की रोपाई के लिए मेड़ तैयार किया जाता है।
  • आलू के बीज की बुवाई के बाद पौधों के विकास के क्रम में सिंचाई के साथ यूरिया खाद का उपयोग किया जाता है।

 

आलू के रोपाई का उचित समय एवं बीजोपचार करने की विधि Planting time and seed treatment

आलू की रोपाई रबी के फसल के साथ की जाती है। अतः अक्टूबर से नवम्बर महीने के बीच का समय उपयुक्त रहता है। अपने क्षेत्र की जलवायु के आधार पर आलू की उन्नत किस्म की बीजों का चयन करना चाहिए। एक अनुमान के अनुसार  1 हेक्टेअर खेत में लगभग 15 -30 क्विंटल कंदो की आवश्यकता पड़ती है।

रोपाई से पहले कंदो को इंडोफिल/कार्बनडाइजिन/कार्बोक्सिन/मैनकोजिब की उचित मात्रा और पानी के मिश्रित घोल में डुबो कर 15 मिनट के लिए छोड़ दिया जाता है।  इसके बाद इन कंदो की रोपाई 24 घंटे के अंदर कर देना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार आलू के कंदो का बीजोपचार करने के बाद रोपाई करने से फसल में रोग लगने की सम्भावना कम रहती है और पैदावार भी अधिक प्राप्त होती है।

 

आलू रोपाई की विधि Potato Planting Method

आलू की रोपाई दो प्रकार से कीजै सकती है –

  • खेत में मेड़ बनाकर

रोपाई से पहले खेत को समतल बनाने के बाद 1 फीट का फासला रखते हुए एक फीट चौड़ाई के मेड़ों का निर्माण किया जाता है। इसके बाद लगभग 16 – 25  सेमी की दूरी रखते हुए लगभग 7 सेमी की गहराई में आलू के बीजों की रोपाई की जाती है। इस प्रकार की रोपाई विधि का उपयोग ज्यादा नमी युक भूमि के लिए उपयुक्त रहता है।

  • समतल भूमि में कंदो की रोपाई

इस विधि में समतल खेत में 60 सेमी की दूरी पर कतार बनाकर तैयार की जाती है। फिर इन कतारों में 15 -20 सेमी की दूरी पर 5 -7 सेमी की गहराई में आलू के बीजों की रोपाई की जाती है। बीजो की रोपाई करने के बाद उस पर मिट्टी चढ़ाते चलते हैं।

 

 

आलू के फसल की सिंचाई  Potato crop irrigation

आलू की रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। फसल की सिंचाई रोपाई के बाद 10 -15 दिनों केअंदर करना चाहिए। इसके बाद खेत में नमी बनाये रखने के लिए प्रत्येक 10 -15 दिनों के अंतराल पर खेतों में सिंचाई करते रहना चाहिए। सिंचाई के दौरान मेड़ को 2 -3 से अधिक पानी में नहीं डूबना चाहिए।

 

 

निराई -गुड़ाई एवं खर -पतवार नियंत्रण  Weeding control

आलू की फसल की पहली निराई -गुड़ाई रोपाई के लगभग 25 दिनों के बाद की जाती है। इसके बाद दो -तीन बार प्रत्येक 15 -20 दिनों के अंतराल में निराई -गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है।

खेत में खर -पतवार नियंत्रण दो प्रकार से की जा सकती है –

  • प्राकृतिक विधि

आलू की फसल की रोपाई के 20 -25 दिनों बाद खेत से खर -पतवार हटाने के लिए निराई -गुड़ाई करने और मेड़ों के ऊपर मिट्टी को व्यवस्थित रूप से चढ़ाने का कार्य किया जाता है।

  • रासायनिक विधि

रासायनिक खाद पेन्डामैथालीन की उचित मात्रा का छिड़काव कंदो के रोपाई के बाद किया जाता है। इससे अनावश्यक खर -पतवार कम मात्रा में जमते हैं।

 

 

फसल सुरक्षा हेतु रोग नियंत्रण Fasal suraksha aur Rog niyantran

आलू की फसल को रोग एवं कीटों से बचाने के लिए सुरक्षा का ध्यान भी रखना होता है। अतः प्रमुख रोग एवं कीटों से फसल सुरक्षा की जानकारी होना आवश्यक है –

  • आलू की फसल का राग हरा होना

आलू के कंदो के विकसित होने पर फसल के हरे होने की समस्या से बचाव के लिए कंदो पर से हेट हुए मिट्टी को  चढ़ाने का ध्यान रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त अधिक तापमान होने के कारण भी फसल के विकास में बाधा पड़ने के कारण से भी फसल का रंग हरा हो जाता है। इसके लिए खेत में नमी बनाये रखने का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

  • अगेती अंगमारी रोग

इस प्रकार के रोग का संक्रमण फसल के विकास के दौरान लगता है। ये पौधों की पत्तियों को संक्रमित करता है। जिससे पत्तियों पर भूरे धब्बे पड़ने लगते है। जिसके बाद पत्तियाँ सूख कर नष्ट होने लगती हैं। इस रोग से बचाव के लिए इंडोफिल अथवा फाइटोलॉन रसायन की उचित मात्रा का छिड़काव पौधों पर करना चाहिए।

  • ब्लैक स्कर्फ रोग

इस प्रकार का रोग कंदो में अंकुरण के दौरान लगता है। इस रोग से प्रभावित होने पर पौधों पर काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। ये रोग पूरी तरह से फसल को नष्ट कर देता है। इससे बचाव के लिए कंदो की रोपाई से पहले कार्बनडाइजिन रसायन मिश्रित पानी की घोल से बीजोपचार करना आवश्यक होता है।

  • हड्डा बीटल

इस कीट का रंग लाल,काला, पीला होता है। इसके आक्रमण से फसल की पत्तियों पर जालीदार छेद होने लगता है। इससे बचाव के लिए पौधों पर ब्यूवेरिया रसायन का छिड़काव करना होता है।

  • कटुआ कीट

इस कीट का लार्वा पौधों को सतह से काटकर नष्ट कर देता है। इस कीट को अक्सर रात के समय पौधों पर देखा जा सकता है। इससे बचव के लिए मेटरीजियम रसायन की उचित मात्रा का छिड़काव फसल पर करना होता है।

 

आलू की खुदाई Potato Digging Process

आलू की उन्नत किस्म की फसल लगभग तीन महीने में तैयार हो जाती है। अतः फसल तैयार होने से 15 दिन पहले खेत में सिंचाई बंद कर देना चाहिए। इसके बाद आलू की खुदाई से 5 -10 दिन पहले पत्तों को काट कर अलग कर देना चाहिए। जिससे आलू की त्वचा सख्त होने में मदद मिलती है और खुदाई करने के दौरान आलू पर काटने के निशान पड़ने की सम्भावना कम रहती है।

खुदाई करने के बाद आलू को छायादार स्थान पर 4 -5 दिनों के लिए फैला कर छोड़ देने से उस पर लगाई मिट्टी की पर्त सूख कर अलग हो जाती है। इसके बाद आलू को आकार के आधार पर छाँट कर अलग कर लेना चाहिए। इसके बाद आलू के भण्डारण के लिए कोल्ड स्टोरेज का उपयोग आवश्यकता अनुसार किया जा सकता है। इससे आलू को अधिक समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिलती है। फिर बाजार की माँग के अनुसार आलू को बेचकर मुनाफा कमाया जा सकता है।

 

 

 

 

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